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आत्मा के शुद्धि के बिना व्यक्तित्व विकास की कल्पना बेमानी: गुरू करमा तानपाई

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फरीदाबाद। रॉयल व्हाइट मोनेस्ट्ररी के प्रमुख आचार्य गुरू करमा तानपाई ने कहा कि आत्मा को शुद्ध करने की जरूरत है। दया, प्रेम, सेवा, शांति जैसे दैविक गुणों से आत्मा की शुद्धि होती है। छात्र जीवन में दैविक गुणों का पाठ भी उतना ही आवश्यक है। जितना पाठ्यक्रम का पाठ महत्वपूर्ण है। दैविक गुणों से ओत-प्रोत व्यक्ति ही सभ्य समाज और फिर एक शक्तिशाली आध्यात्मिक देश के निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान देता है।

वे बुधवार को एनएच 3 स्थित डीएवी शताब्दी कॉलेज में ‘ध्यान के माध्यम से ज्ञानोदय’ के विषय पर आयोजित राष्ट्रीय कार्यशाला में छात्रों को संबोधित कर रहे थे। इसका आयोजन कॉलेज और सूर्या एनजीओ के सहयोग से हुआ था। गुरू करमा तानपाई ने छात्रों को सफल जीवन जीने की कला सिखाई। मन, मस्तिष्क और वाणी को वश में करने के गुर बताए। जिन दैविक योग से ऋषिओं व मुनियों ने ज्ञान को प्राप्त किया था। उसकी विधि बधाई। इसे नियमित अंतराल पर दोहराने को प्रेरित किया। उन्होंने कहा कि स्वर्ग और नर्क दोनों इसी धरती पर है। यह व्यक्ति के हाथ में है। कि वह किस प्रकार का जीवन व्यतीत करें। छात्रों को यह समझाया कि क्रोध कई बड़ी समस्याओं का कारण है। यदि क्रोध पर नियन्त्रण प्राप्त कर लिया जाए तो सम्पूर्ण विश्व में शांति होगी। ध्यान व योग द्वारा ही आत्मिक शांति की प्राप्ति की जा सकती है। उन्होंने ओम के मंत्र का उच्चारण कराकर छात्रों को यह अहसास कराया कि इस मंत्र द्वारा वे नकारात्मक ऊर्जा से मुक्त होकर स्वयं कोे पवित्र कर सकते है। उन्होनें छात्रों को दिव्य योगा भी सिखाया। राष्ट्रीय कार्यशाला का संयोजक डॉ. सुनीति आहूजा थी। कार्यशाला की अध्यक्षता प्रिंसिपल डॉ. सतीश आहूजा ने की। इसके पहले कॉलेज कैंपस पहुंचने पर आचार्य गुरू करमा तानपाई का स्वागत किया। कार्यशाला के पैटर्न डा. आहूजा ने छात्रों से कहा कि व्यक्तित्व विकास छात्रों के सर्वागीण विकास के लिए अत्यन्त आवश्यक है। व्यक्तित्व के विकास में ध्यान व आत्म जागरण का विशेष महत्व होता है। इस कार्यशाला को आयोजित करने का उद्देश्य छात्रों को इस बात के लिए प्रेरित करना है कि अपने लक्ष्य की ओर ध्यान केन्द्रित करके जीवन में सफलता प्राप्त कर सकते हैं। कार्यशाला की संयोजिका डा. सुनीति आहूजा ने कहा कि इस कार्यशाला को आयोजित करने का उद्देश्य छात्रों को आत्म चिन्तन, आत्म नियंत्रण व आत्मिक ज्ञान के लिए प्रेरित करना था। इसके माध्यम से छात्रों को यह सिखाया गया कि सच्ची खुशी सच्ची सफलता अध्यात्मिक मार्ग पर चलते हुए पुण्य कर्म करने में है। भगवान कही बाहर नहीं हमारे अन्दर ही होता है। उसे पहचानने की जरूरत है। कार्यशाला में 400 छात्रों ने भाग लिया।
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